saptrishi

 ऋषि पंचमी, सप्त ऋषियों के लिए.....

ऋषि शब्द, ऋ और ईषि से बनता है जिसका अर्थ है ईश के विज्ञान को जानने वाला (divine scientist) और उसका प्रदाता। सप्त ऋषि साधारण और मूल भूत विद्याओं के इलावा सात भिन्न भिन्न विद्याओं में पारगंत हैं। एक मन्वन्तर के एक युगकाल के सात भिन्न भिन्न ऋषि होते हैं।
भारत और विभिन्न पुरातन सभ्यताओं में तारों और सप्तऋषियों को सदैव एक ऊंचा स्थान दिया जाता रहा है परंतु, मानवीय चेतना के कालान्त गिरने पर सप्तऋषि और तारागण मात्र सांकेतिक ही रह गए। भारत के कई प्रांतो में आज भी तारामंडल की पूजा की जाती है परंतु यह मात्र संकेत है क्योंकि अज्ञानवश और ज्ञान के लुप्त होने के कारण आज तारामंडल का ज्ञान और सप्तऋषियों के विषय में अधिक कुछ भी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि ऋषि परंपरा भी इस धरा से विलुप्त हो गई है।
सप्तऋषियों ने गुरु कुल परंपरा, सामगान, विमान विद्या, गणितीय सूक्त, सोमविद्या, ज्योतिष्मीति, शब्दब्रह्म इत्यादि कई विद्याओं की रचना की। और, सप्तऋषि मन्त्रदृष्टा अर्थात ध्वनि को देखने की क्षमता होने के कारण इस पृथ्वी लोक पर कई ध्वन्यात्मक यज्ञ करने में भी सक्षम थे। ऋषि विद्या, तप, धन, दृढ़ता, युवावस्था और उच्च कुल आदि गुणों में प्रधान थे।
परन्तु, मनुष्य के नीच-स्तरीय प्रलोभन और केवल मानसिक सुख की इच्छा के कारण ये सब विद्याएं विलुप्त हो चुकी हैं और विद्या का न होना की एक मात्र संकेत है कि जीवात्माएँ इस पार्थिव जगत के माया जाल और कालाधीन फंस चुकी हैं। इसीलिये आज काली शक्तियों का साम्राज्य स्थापित हो पाया है और समस्त संसार विद्या को त्याग, कलंकित कर ऐश्वर्यों को चुनता है।
एक नया साम्राज्य स्थापित होगा, विद्याएँ पुनः इस पृथ्वी पर लौटेंगी, सत्य पुनः उजागर होगा, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी पुनः अपनी पूर्ण स्वतंत्रता में ऋषियों और गुरुओं के साथ इन मातृकाओं में विचरण करेंगे। ~ वि



Comments

Popular posts from this blog

solar light circle

decoding the crab

saturn ~ discipline