चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में

चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में..... निरोगी करने वाले 100 तारों का समूह.....

दिन का आरंभ प्रातः नियमित वंदना, सूर्यपान, अभ्यंग, उबटन और स्नान से.....
जिस समय कलि का युग चरम सीमा पर हो, चारों तरफ केवल विकृत, दीन, अस्वस्थ देह, मानसिकता से रोगी, लोभी, द्वेष से दूषित और कपटी लोगों का साम्राज्य हर तरफ हो, उस बीच भी धर्म की ध्वजा लहराएगी। सनातन का समस्त पृथ्वी पर पुनः बोलबाला होगा। सारी पृथ्वी फिर से ऐश्वर्यवति, भक्ति से निर्मल और मुक्ति के फल प्रदान करने वाली होगी.....
सनातन का हिंदू से नहीं यद्यपि सनातन शाश्वत नियमों (eternal laws) का नाम है। सनातन शब्द का मूल सनत है अर्थात् जो "स" है "न" कि केवल "त", वर्ण विद्या के अनुसार जिसका अर्थ जो विश्राम में रखे, शांति प्रदान करने वाला, सहज और हर समय लागू हो, न कि केवल पार्थिव देह में रहते हुए। जो आत्मा (spirit) के स्तर पर कार्यशील है न कि केवल तन के स्तर पर। वह सनातन है.....
सनातन जीवन शैली सबसे सरल, उत्तम, सोम को सदैव बढ़ाने वाली, तपस्या में स्थिर रखने वाली, परम् शांति प्रदान करने वाली और मोक्षकारक है। सनातनी जीवन शैली ही सुहृद बनाने वाली है और समस्त संसार की जीवात्माओं को जोड़ने वाली है.....
आज के युग में सरल ही अति कठिन है क्योंकि कलियुगी शहरी जीवन शैली ने मनुष्यों की इंद्रियों को पूर्ण रूप से विखंडित, प्रमाण से भरी हुई, दिव्यता से पूरी तरह विरुद्ध, इंद्रियां और मन इतने वेगवान की शहरी सुविधाओं, वाद विवाद, परनिंदा, द्वेष और पापचार के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते और, यही उनकी वाणी में, व्यवहार में और आचरण में प्रदर्शित होता है।
इसी दूषित जीवन शैली के कारण न तो मनुष्यों का पापाचार समाप्त होता है और ना ही उन्हें दिव्यता की ओर अग्रसर होने का कोई कारण बन पाता है। वे केवल पशु जैसा जीवन ही व्यतीत करते हैं, यद्यपि सनातन शाश्वत नियमों को अपनाने की चेष्टा करना सब मनुष्यों के हाथ में है.....
दक्षिण भारत में आज भी कुछेक स्थानों पर इन पद्धतियों का अभ्यास किया जाता है.....
कुछ ही समय बाकी है, जितनी जल्दी सनातनी जीवन शैली को चुनें, धर्मानुसार अर्थात् ईश्वरीय नियमानुसार जीवन जीएं, नित प्रतिदिन अध्ययन करें, आचरण और वाणी को शुद्ध करें..... यही पृथ्वी का भविष्य है..... ~वि



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