चंद्रमा उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में
शुक्रवार, चंद्रमा उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में..... लक्ष्य प्रदात्री लक्ष्मी, कुंडलिनी का नक्षत्र, सोम प्रदाता चंद्र.....
"कुंडलिनी योग"
उत्तरभाद्रपद का चिन्ह कुंडलिनी है जोकि अपने उद्गम स्थान मेरूडंड के मूल में कुंडल रूप में सुप्त अवस्था में विराजमान है। इसी शक्ति का उर्ध्वगमन जीवात्मा को उर्ध्वगति प्रदान करने वाला है। सहस्त्र गुह्य विद्याओं को देह रूपी वृक्ष में ही उजागर कर देने वाला है.....
इस महाशक्ति कुंडलिनी का परम् लक्ष्य सहस्त्रदल पद्म में पहुंचना है और, कुंडलिनी का सहस्त्रदल में पहुंचना ही जीवात्मा का पार्थिव लोक से मुक्ति का कारक और उच्च लोकों में जन्म का कारक है। प्रत्येक केंद्र से गमन करते हुए शक्ति भिन्न भिन्न प्रकार की विद्याओं, शक्तियों को स्राव रूप में प्रदान करने वाली हैं.....
कुंडलिनी का उत्तरगामी होना जागृति और दक्षिणगामी होना सुप्तावस्था को दर्शाता है क्योंकि मूलाधार दक्षिण है और सहस्त्रार उत्तर है। और, उत्तरभाद्रपद जीवन यात्रा का अंत है इसीलिए इसका चिन्ह अर्थी के बाद के पाय भी है। यही आकाश गंगा का पृथ्वी पर उतरना भी दर्शाता है, जैसे शिव आकाश गंगा को जलरूप में पृथ्वी पर उतारते हैं जिससे पितरों, तपस्वियों, योगियों, साधकों आदि का उद्धार होता है.....
कुंडलिनी शक्ति सागर जैसे विशाल स्त्रोत को स्वयं में समाए आज्ञा पर त्रिवेणी अर्थात् त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का संगम करती है जहां इडा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों का संगम गंगा, यमुना और सरस्वती स्वरूप में होता है और, सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों भेद खुल जाते हैं। जीवात्मा इस जगत का स्वप्नरूप प्रत्यक्ष दर्शन कर पाती है और, इस पार्थिव लोक के प्रति अति वैराग्य और वास्तविक लोक के प्रति योग का आरंभ होता है। यहीं इस शक्ति का बहुआयामी स्वरूप देह रूप में ही उत्पन्न हो जाता है। त्रिगुण से मुक्ति, पार्थिव जगत से मोक्ष और बहुआयामी जगत में प्रवेश.....
मनुष्य के स्वभाव, वाणी, आचरण, व्यवहार कर्म से कुंडलिनी शक्ति स्वचालित है और, दिन प्रतिदिन के नियमित कर्म से स्वतः ही उर्ध्वगामी हो उठती है, ज्ञान का अथाह सागर फलस्वरूप प्रकट कर देती है, ब्रह्माण्ड के गुह्य रहस्यों को स्पष्ट उजागर कर देती है और, जीवात्मा परम् आनंद का अनुभव करती हुई अपने परम् लक्ष्य परमात्मा में लीन हो जाती है.....वि

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