श्रवण नक्षत्र
सोमवार, चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में.....
"श्रवण का अर्थ है सुनना"
ये ब्रह्मांड दिव्य ध्वनि से उत्पन्न हुआ। उसी ध्वनि से प्रकाश उत्पन्न हुआ और वही ध्वनि प्रत्येक मनुष्य को दर्शाती है। ऐसा समझना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य एक ध्वनि है और वह ध्वनि यदि दिव्य ध्वनि से जुड़ी हो तो मनुष्य ऊर्ध्वगति को प्राप्त करता और, यदि वही ध्वनि सांसारिक ध्वनियों से जुड़ी हो तो मनुष्य बार बार संसार में गिरता है.....
प्रत्येक मनुष्य ध्वनियां वाणी रूप में सुनता, ध्वनियों को शब्द रूप और वाक्य रूप में बोलता और ध्वनियों को लिपिरुप में लिखता है। कोई ध्वनि उसे सत में स्थापित कर देती हैं, तो कोई ध्वनियां उसके हृदय को मलीन कर देती हैं.....
श्रवण नक्षत्र का स्वामी मन है। स्पष्ट ही है कि किसी की वाणी, किसी के शब्द, किसी के वाक्य अर्थात् किसी की ध्वनि आपके मन पर सीधा प्रभाव डालती हैं और हर ध्वनि आपके हृदय पर एक छाप छोड़ती है इसीलिए श्रवण नक्षत्र का चिन्ह ही "पैरों का निशान" है। उसी तरह जैसे विष्णु के वक्ष स्थल में ऋषि भृगु के पैरों के निशान पड़ गए, इसी तरह बोले गए शब्द बीज रूप मनुष्यों के हृदय पर पैरों के निशान छोड़ते हैं.....
इसी लिए जो जिसे सुनता है, उसकी गति वैसी ही हो जाती है। दुर्योधन और अर्जुन दोनों कृष्ण के सामने हैं परंतु एक कृष्ण को ध्वनि को सुन पाता है तो दूसरा सुन कर भी बेहरा है। सो वैसी ही उसकी गति होती है.....
जिसने सुनना सीख लिया, उसके दुःख और पाप दोनों का अंत हो जाएगा। यही प्राचीन गुरुओं की गुह्य शिक्षा है.....

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